Friday, January 20, 2012

Raju Ramnaresh Kewat 'यदि 42 सुखोई न खरीद कर वैसे ही किसी पुराने सुखोई की नक़ल तैयार की जाती तो कितना खर्च आता और उससे क्या-क्या लाभ होते' ?_ pankaj bharat swabhimani. :- "इसके लिए मैंने 30 हज़ार करोड़ का एक प्रोजेक्ट बनाया| अब मेरे पास दो विकल्प थे या तो एक करोड़ लोगों को लेकर 30 हज़ार करोड़ का निवेश किया जाता, जिसमे प्रत्येक के हिस्से में 30 हज़ार रुपये आते| किन्तु यह अधिक कारगर न लगा तो मैंने दूसरा विकल्प सोचा| यदि 30 हज़ार लोगों को साथ लेकर 30 हज़ार करोड़ खर्च किये जाएं तो प्रत्येक के हिस्से में एक एक करोड़ का निवेश आता है| किसी एक अच्छे वैज्ञानिक को पांच-दस लाख रुपये देकर किसी विमान की नक़ल तैयार कराई जाती| मुझे नहीं लगता कि इस काम में इससे अधिक खर्च आता| बल्कि हमारे बड़े से बड़े वैज्ञानिक यह काम फ़ोकट में ही करने को तैयार हो जाएंगे| बस जो तकनीकी खर्चा आएगा, वह झेलना पड़ेगा| नक़ल तैयार होने के बाद तो यह काम कुछ भी नहीं रह जाएगा| यकीन मानिए, छोटा-मोटा ही सही किन्तु मैं भी एक इंजिनियर ही हूँ| विमान के आकार-प्रकार और तकनीकी का पता चलने के बाद में उसकी डुप्लीकेट कॉपी बनाना अधिक कठिन नहीं होगा| क्योंकि अब बाकी तो केवल असेम्बलिंग का काम ही बचा न| फिर भी यदि मुझ पर विश्वास न हो तो किसी अच्छे Aeronautical Engineer से संपर्क किया जा सकता है| एक वैज्ञानिक के बाद बाकी बचे 29,999 लोगों में ऐसे केवल 999 Engineers जुगाड़ना भारत सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है| इन इंजीनियर्स में कुछ Aeronautical होंगे, कुछ Electronics, कुछ Mechanical, कुछ Electrical, कुछ Metallurgy बस| चलिए वैज्ञानिक एक नहीं पांच चाहिए तो चार इंजीनियर्स कम किये जा सकते हैं| प्रोजेक्ट 30,000 लोगों से बाहर नहीं जाएगा| 99 बड़े व अनुभवी इंजीनियर्स को 50,000 रुपये मासिक वेतन पर रखा जाए| ध्यान रहे, यह कोई बड़ी बात नहीं है| प्रत्येक के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| चूंकि कुल विमानों की संख्या 42 है, इस हिसाब से हमारे पास करीब सवा दो अनुभवी इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे| जो इन सबके लिए सुपरवाइज़री करेंगे| करीब दो सौ मध्यम क्रम के इंजीनियर्स को करीब 30-35 हज़ार के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इस श्रेणी के हमारे पास करीब पांच इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे जो विमानों के किन्ही मुख्य हिस्सों पर ध्यान देंगे| फिर निम्न वर्ग के 700 नए इंजीनियर्स को करीब 25,000 रुपये के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इनकी उपलब्धता हमारे पास करीब 17 इंजीनियर्स प्रति विमान होगी| जो विमान के एक, दो या तीन भागों का काम सम्भालेंगे| इंजीनियर्स के बाद करीब 5000 या इससे अधिक Technicians को करीब 15,000 के मासिक वेतन पर रख करीब 120 या अधिक Technicians प्रति विमान पर काम लिया जा सकता है, जो विमान का बाकी तकनीकी काम संभाल सकते हैं| सबसे अंत में करीब 23,000-24,000 हज़ार अन्य छोटे-मोटे कर्मचारियों को करीब 10,000 रुपये के मासिक वेतन पर रख लिया जाए, जिससे कि हमारे पास करीब 570 अन्य कर्मचारी प्रति विमान उपलब्ध हों| कुछ लोगों को शंका हो सकती है कि यह काम आखिर कितने दिन चलेगा| मैं कहता हूँ कि पूरा जीवन चलता रहेगा| याद रहे, प्रत्येक व्यक्ति के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| सबसे अधिक वेतन पाने वाले इंजीनियर्स को 50,000 मासिक मिल रहा है| इस हिसाब से वह करीब 16-17 वर्षों तक यह काम कर सकता है| ठीक है, जब वेतन बढाने की बारी आए तब भी कोई चिंता नहीं| 30 हज़ार करोड़ का ब्याज इतना होगा कि ये Money Rotation जीवन भर चलता रहेगा| ये इतना धन है कि विमान को बनाने के लिए लगने वाले Raw Materials का खर्चा भी निकल सकता है| शायद थोडा बहुत ऊपर से लगाना पड़ जाए| इसमें कोई बड़ी बात नहीं है| विदेशों में इतने रुपये फूंकने से यह कहीं बेहतर है| अमरीका, रूस, फ्रांस आदि देश इसे अपने खर्चे के हिसाब से मुनाफा कमा कर बेचते हैं| हमारा माल व मजदूरी उनसे कहीं अधिक सस्ते हैं| इन देशों में मिलने वाला माल व मजदूरी हम भारतीयों के लिए कम से कम दस गुना महंगे हैं| शायद कुछ लोगों को इस प्रकार तैयार विमानों की गुणवत्ता पर शंका हो| कोई बात नहीं इस शंका को दूर करने के लिए दो उपाय किये जा सकते हैं| एक तो इस प्रोजेक्ट में किसी भी प्रकार के आरक्षण की कोई संभावना न रखी जाए, जिससे की बेहतरीन वैज्ञानिक व इंजीनियर्स यह काम सम्भालें न की भीख में नौकरी पाने वाले, आरक्षण के द्वारा गुणी लोगों का हक़ मारने वाली जमात| दूसरा उपाय, एक से डेढ़ लाख रूपये मासिक पाने वाले बीस-पचास अति अनुभवशाली इंजीनियर्स को और रखा जा सकता है| चिंता न कीजिये, धन बहुत है| इसकी कोई कमी भारत देश में नहीं है| अब बताइये कि 30,000 करोड़ के इस रक्षा समझौते में किसी को क्या फायदा हुआ? सारा फायदा विदेशों को और हमारे खाते में केवल नुकसान| यदि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अपना थोडा सा अर्थशास्त्र उपयोग में ले सकें तो 30,000 लोगों को रोज़गार भी मिल जाएगा| ध्यान रहे चीनी ऐसा कर चुके हैं| साल 2009 में इंधन ख़त्म होने की वजह से एक अमरीकी विमान को चीन में उतारना पडा था| आधिकारिक रूप से इस विमान को मुक्त करने में चीन ने दस दिन लगा दिए और इन दस दिनों में चीन ने इस विमान की पूरी जन्मकुंडली बनाकर वैसे पचासों विमान खड़े कर दिए| जब चीन यह काम कर सकता है तो मात्र 400 करोड़ की लागत से "चंद्रयान" बनाने वाले दिग्गज भारतीयों के लिए यह कौन सी बड़ी बात है? अभी तो 400 करोड़ में एक विमान खरीद रहे हैं, जबकि हम भारतीय 400 करोड़ में चंद्रयान जैसा उपगृह बना चुके हैं, जिसे देख अमरीकी आँखें भी फटी रह गयीं थीं| मुझे तो लगता है कि भारत देश को एक अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खडा करने में अधिक से अधिक चालीस-पचास करोड़ का खर्चा आएगा या शायद उससे भी कम| और यही अर्थशास्त्र यदि अन्य दिशाओं में भी लगाया जाए तो भारत हर वो निर्माण करने में सक्षम है, जिसकी इस समय दुनिया को आवश्यकता है| हमे तो नक़ल करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है| भारत सब कुछ खुद करने में ही सक्षम है| फिर न हमे रक्षा समझौतों की ज़रूरत होगी, न वाल मार्ट की और न ही अन्य विदेशी समानों की जो हमारे घरों तक पर अपना कब्ज़ा जमा चुके हैं| सोचिये ज़रा, यदि इन सब विदेशी वस्तुओं का भी बहिष्कार हम भारतीय कर दें तो अपनी अर्थव्यवस्था व निर्माण से कितने ही भारतीयों को अच्छा ख़ासा रोज़गार मिल सकता है| जब केवल लड़ाकू विमान बनाने में ही 30,000 भारतीयों को काम मिल रहा है तो सभी क्षेत्रों में स्वावलंबी होने पर कितने ही भारतीयों को रोज़गार मिलेगा| शायद काम इतना बढ़ जाएगा कि लोग कम पड़ जाएंगे| भारत देश में कोई भी बेरोजगार नहीं होगा| "इस सारी केलकुलेशन में वो छब्बीस हजार करोड़ रुपये कहाँ हैं जो ऐ के अंटोनी रिसीव करेंगे और सोनिया मेडम की बहनों के नाम पर इटली में जमा करेंगे. 42 विमानों की कीमतें तो चार हजार करोड़ से ज्यादा नहीं तभी तो रोज गिरते हैं" ! "आज भी हम भारतीय यह मानते हैं कि 17 दिसंबर 1903 में राईट बंधुओं ने पहला विमान बना कर अमरीका के दक्षिण कैरोलीना के समुद्री तटों पर उड़ाया जो 120 फुट की ऊंचाई तक उड़ने के बाद नीचे गिर गया था| जबकि इससे आठ वर्ष पहले एक मराठी श्री शिवकर बापूजी तलपडे ने सन 1895 में मुंबई के चौपाटी के समुद्री तट पर एक विमान बना कर उड़ाया था जो 1400 फुट की ऊंचाई तक उड़ा और सुरक्षित नीचे उतार लिया गया| मज़े की बात इसमें कोई भी चालक नहीं था| इस महान वैज्ञानिक ने इसे ज़मीन से ही नियंत्रित कर उड़ाया था| उससे भी अधिक मज़े की बात यह है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने महर्षि भारद्वाज के विमानशास्त्र से ली जो भारद्वाज मुनि कई हज़ार साल पहले लिख चुके हैं| बाद में अंग्रेजों ने झांसा देकर उनसे इस विमान का डिजाइन हथिया लिया| इस घटना के कुछ ही समय पश्चात श्री शिवकर बापूजी तलपडे की रहस्यमय तरीके से मौत हो गयी| किन्तु मैकॉले मानस पुत्र इस सच्चाई को आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं कर पाए| जबकि आज तक राईट बंधुओं का गुणगान गाए जा रहे हैं"| 'aj sabhi ko pase ki padi aam admi to majdur daily kamata hi ki wo apna ghar chla ske lekin srkar to bus har jagah se apne 100 sal vans ke leye pasae jutane me lagi yahi to badnasbi hi india ki aj bhi hamare engineering college me koi bhi naaya syllabus nahi research pr sab purne pattern hi jo ki real eng. job me koi use nahi hi isi leye to india me sirf computer eng nahi computer bade babu bol sakte bus kisi tarah kam kr leye ho gaya' !...

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